Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 37, Verses 14–17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 37, verses 14–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 37 · श्लोक 14-17
संस्कृत श्लोक
बलिमुक्ताबलपुरं मर्यादाक्रमवर्जितम् ।
सर्वार्ताशेषवनितं परस्परहृताम्बरम् ॥ १४ ॥
प्रलापाक्रन्दपुरुषं विसंस्थानपुरान्तरम् ।
लुठदुद्याननगरं व्यर्थानर्थकदर्थितम् ॥ १५ ॥
चिन्तापरासुरगणं निरन्नफलबान्धवम् ।
अकाण्डोत्पातविवशं ध्वस्ताशामुखमण्डलम् ॥ १६ ॥
सुरार्भकपराभूतं भूतैराक्रान्तमन्त्यजैः ।
भूतरिक्तमलक्ष्मीकमुच्छिन्नप्रायकोटरम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
मत्स्यन्याय का ही उपपादन करते है ।
उसमें बलवानों द्वारा दुर्बलो के नगर छीने गये थे, मर्यादा, या क्रम का कहीं नाम-निशान न था,
वनिताएँ सब लोगों से पीडित थी, नगर का मध्य भाग खण्डहर मेँ परिणत हो गया था, सब पुरुष
प्रलाप ओर रोदन से आक्रान्त थे, परस्पर एक दूसरे के वस्त्र हरते थे, बगीचे और नगर के वृक्ष ठह
गये थे, व्यर्थ अनर्थो से सारा पाताल पीडित था, सब के सब असुर चिन्ताग्रस्त थे, अन्न, फल और
बन्धु-बान्धवों का अभाव हो गया था, अनवसर के उत्पात से सारा पाताल विवश था, दिशाओं के
मुख धूलि से व्याप्त थे, देवताओं के बच्चे भी उसका तिरस्कार करते थे, चाण्डाल, कुत्ते, सियार,
राक्षस, पिशाच आदि तामस प्राणियों से वह आक्रान्त हो गया था, यहाँ के आदिनिवासी भद्र प्राणियों
से वह शून्य हो गया था, उसकी शोभा नष्ट हो चुकी शी ओर सब अटारियाँ भग्न प्रायः हो चुकी
थी