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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 37, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 37, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 37 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

अनियतवनितार्थमन्त्रयुद्धं हृतधनदारविरावितं समन्तात् । कलियुगसमयोद्भटोत्कटाभं तदसुरमण्डलमाकुलं बभूव ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

वह असुर मण्डल चारों ओर से भयोद्रिग्न हो गया था, उसमें स्तर्यो, धन, मन्त्र, तन्निमित्तक युद्ध अनियत (नियमरहित) हो गये थे जिनकी धन-सम्पत्ति ओर स्त्रियाँ हरी गई थी, उन लोगों के विलाप से वह कोलाहल युक्त था, अतएव कलियुग के समय में दूसरों के धन हरने में शूरवीर क्रूर दस्युओं के तुल्य था