Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 38, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 38, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 38 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
असुरपुरमवाप्य प्रोद्धताचारघोरं कमलमिव विवस्वान्दैत्यमुद्बोधयामः ।
जगदिदमखिलं स्वस्थैर्यमभ्यानयामो घनविधिरिव शैले चञ्चलं मेघजालम् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
हम मर्यादारहित दस्युओं के अनाचार से भयानक पाताल में
जाकर जैसे सूर्य कमल को विकसित करता हे वैसे ही प्रह्लाद को समाधि से जगाते हैं, उससे सम्पूर्ण
जगत् को पूर्वोक्त रीति से स्थिरता को प्राप्त करते हैं, जैसे कि वर्षा ऋतु चंचल मेघराशि को पर्वत पर
स्थिर करती हे