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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 4, Verses 11–13

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 4, verses 11–13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 11-13

संस्कृत श्लोक

मुने मन्दारमञ्जर्यस्तरङ्गा वामृताम्भसः । न तथा ह्लादयन्त्यन्तर्यथोदारधियां गिरः ॥ ११ ॥ यद्यद्राघव संयाति महाजनसपर्यया । दिनं तदिह सालोकं शेषास्त्वन्धा दिनालयः ॥ १२ ॥ राम राजीवपत्राक्ष प्रकृतार्थमिहाव्ययम् । मुनिमाबोधय पुनः प्रसादे समवस्थितम् ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

सिद्ध रस से बनाये गये सिद्ध अंजन से जिन्हे दृष्टि प्राप्त हो गई, ऐसे जन्मान्ध लोग जिस प्रकार सुवर्ण को देखने लगते हैं वैसे ही ब्रह्मरसरूपी अंजन से प्राप्त प्रत्यग्‌ दृष्टि वाले हम लोग निर्दोष आत्मा को देखने के लिए उपयुक्त हो गये हैँ । आपकी उक्तिरूपी शरद्ऋतु से हमारे हृदयरूपी आकाश में स्थित संसारवासना नामक कुहरा नष्ट होने लग गया है। हे मुनिजी, उदारबुद्धि पुरुषों की उपदेशवाणियाँ जैसे हृदय को आह्लादित करती हैँ वेसे मन्दार के फूलों के गुच्छे अथवा अमृत सागर की तरंगें आह्वादित नहीं करती । हे रघुवर, जो- जो दिन महापुरुषों की पूजा से व्यतीत होता है, वही दिन प्रकाशयुक्त है, शेष दिन अन्धकार से आवृत्त हैं। हे कमल के समान विशाल नेत्रवाले श्रीरामचन्द्रजी, प्रस्तुत अविनाशी तत्त्व को प्रसन्नता में स्थित मुनि से पूछो