Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 4, Verses 25–27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 4, verses 25–27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 25-27
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
भगवन्सर्वधर्मज्ञ तवैवैतद्विजृम्भितम् ।
यदहं परमोदारो बुद्धवान्वचनं तव ॥ २५ ॥
यदादिशसि तत्सर्वं तथैव न तदन्यथा ।
अपास्तनिद्रेण मया वाक्यार्थो हृदि चिन्तितः ॥ २६ ॥
भवान्धकारक्षतये भवतोक्तिविवस्वता ।
ह्यः प्रसादितमाह्लादि वाग्रश्मिपटलं प्रभो ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे भगवन्, हे सब धर्मो के ज्ञाता, आपके ही प्रभाव का यह विस्तार है,
जो कि मैं परम उदार होकर आपके वचन को समझ सका । जैसे आप अदेश देते हैं, वैसे ही वह
सब मैने किया, उससे विपरीत नहीं किया हे । रात्रि में निद्रा का त्याग करके मैंने हृदय में वाक्यार्थ
का चिन्तन किया हे प्रभो, उपदेश योग्य अर्थ के प्रकाशन में सूर्यरूप आपने संसाररूप अन्धकार
के विनाश के लिए जडतारूप शीत को हटाने से सुख देनेवाला वाणीरूपी किरणों का समूह कल
फैलाया था