Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 40, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 40, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
प्रलुठत्स्वपि शैलेषु कल्पाग्निषु दहत्स्वपि ।
वहत्सूत्पातवातेषु स्वात्मन्येव हि तिष्ठति ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
पर्वतो के ढहने पर भी, प्रलयाग्नियों के धधकने पर भी
ओर उत्पातवायुओं के बहने पर भी तत्त्वज्ञानी आत्मा में स्थित रहता है