Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 41, Verses 1–2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 41, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 41 · श्लोक 1, 2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
जगद्रत्नसमुद्गेन त्रैलोक्याद्भुतदर्शिना ।
इत्युक्ते पद्मनाभेन ज्योत्स्नाशीतलया गिरा ॥ १ ॥
प्रह्लादनामा देहोऽसौ विकाशिनयनाम्बुजः ।
मुदोवाच वचो धीरो गृहीतमननक्रमः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
कारण जगद्रूप रत्नों के सन्दूकरूप ओर सृष्टिकाल में त्रलोक्यरूपी अद्भुत पदार्थ का दर्शन करनेवाले
भगवान् विष्णु चाँदनी के समान शीतल वाणी से पूर्वोक्त बातें कहने पर पूर्वोक्त प्रह्लाद नामक देह ने, मारे
आनन्द के जिसके नेत्रकमल विकसित थे ओर जिसने मनन ग्रहण कर लिया था, प्रसन्नता से निम्न
निर्दिष्ट वचन कहे