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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 41, Verses 3–4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 41, verses 3–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 41 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

प्रह्लाद उवाच । हिताहितविचारेण राजकार्यशतेन च । अत्यहं श्रमितो देव क्षणं विश्रामतां गतः ॥ ३ ॥ भगवंस्त्वत्प्रसादेन स्थितिः सम्यगथागता । समाधावसमाधौ च रूपेणाहं समः सदा ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रह्लाद ने कहा : भगवान्‌, असुरो का क्या हित है और देवताओं का क्या अहित है, इस विचार से और सैकड़ों राज्यकार्यो से मैं अत्यन्त थक गया था, अतएव एक क्षण के लिए मैंने विश्राम लिया