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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 41, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 41, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 41 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

चिरमन्तर्महादेव दृष्टोऽस्यमलया धिया । पुनर्बहिरयं दृष्ट्या दिष्ट्या देव प्रदृश्यसे ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

हे देवाधिदेव, आपके प्रसाद से तत्त्वबोध द्वारा स्वरूपावस्थिति मुझे भली-भाँति प्राप्त हो गई है। मैं समाधि और असमाधिमें तथा सदेह ओर विदेह मुक्तियों मे पारमार्थिक रूपसे सदा समान ही हू ॥४।। हे महादेव, मेने निर्मल अखण्ड मानस साक्षात्कार वृत्ति से चिरकालतक आपके दर्शन किये हे । इस समय फिर चर्म चक्षु से भी बड़े भाग्यवश ये आप मेरे दृष्टिगोचर हो रहे हैं