Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 41, Verses 27–30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 41, verses 27–30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 41 · श्लोक 27-29
संस्कृत श्लोक
अथैनं हरिराहूतैः क्षीरोदाद्यैर्महाब्धिभिः ।
गङ्गादिभिः सरित्पूरैः सर्वतीर्थजलैस्तथा ॥ २७ ॥
सर्वविप्रर्षिसङ्घैश्च सर्वसिद्धगणैः सह ।
पुनर्विद्याधरयुतो लोकपालसमन्वितः ॥ २८ ॥
अभ्यषिञ्चदमेयात्मा दैत्यराज्ये महासुरम् ।
मरुद्गणैः स्तूयमानं पूर्वं स्वर्गे हरिं यथा ॥ २९ ॥
सुरासुरैः स्तूयमानं स्तूयमानः सुरासुरैः ।
अभिषिक्तमुवाचेदं प्रह्लादं मधुसूदनः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
के जलों से, सब विप्र ऋषियों ओर सब सिद्धगणों के साथ असुरराज प्रह्लाद का दैत्यराज्य में ऐसे ही
अभिषेक किया जैसे कि पहले स्वर्ग में देववृन्दों से इन्द्र का अभिषेक किया था