Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 42, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 42, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
परे पदे परिणतं पाञ्चजन्यस्वनैर्मनः ।
कथं प्रबुद्धं भगवन्प्रहादस्य महात्मनः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
विदेह मुक्त के साथ समाधि मुक्त के विश्रान्ति सुख की समता होने पर फिर उसके व्युत्थान में हेतु
जानने की इच्छा कर रहे रामचन्द्रजी पूछते हैं :
भगवान्, महात्मा प्रह्नाद का परम पद में परिणत मन पाँचजन्य शंख की ध्वनि से कैसे प्रबुद्ध हुआ ?
भाव यह है कि मन का विलय होने पर पाँचजन्य शंख ध्वनि का श्रवण ही दुर्लभ है, फिर इससे वह कैसे
प्रबुद्ध हुआ ?