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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 42, Verses 13–15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 42, verses 13–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 13-15

संस्कृत श्लोक

सैव देहक्षये राम पुनर्जननवर्जिता । विदेहमुक्तता प्रोक्ता तत्स्था नायान्ति दृश्यताम् ॥ १३ ॥ भृष्टबीजोपमा भूयो जन्माङ्कुरविवर्जिताः । हृदि जीवद्विमुक्तानां शुद्धा भवति वासना ॥ १४ ॥ पावनी परमोदारा शुद्धसत्त्वानुपातिनी । आत्मध्यानमयी नित्यं सुषुप्तस्येव तिष्ठति ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामचन्द्रजी, वही देह धारण में हेतुभूत प्रारब्ध शेष का भोग द्वारा क्षय होने पर पुनर्जन्म से रहित विदेह मुक्ति करी गई हे । विदेह मुक्ति में स्थित भुने हुए बीजों के सदुश अतएव पुनर्जन्म रूपी अंकुर से रहित पुरुष देहदुश्यता को प्राप्त नहीं होते, किन्तु जीवन्मुक्त पुरुषों के हृदय में शुद्ध, पवित्र, तृष्णा, कार्पण्य आदि से रहित, आत्मध्यानमयी शुद्धसत्त्वानुपातिनी वासना ऐसे ही रहती है जैसे कि सुषुप्त पुरुष के हृदय में रहती है