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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 43, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 43, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

कर्णाभिवाञ्छ्यमानानि पवित्राणि मृदूनि च । सुखयन्ति गृहीतानि पुष्पाणीव वचांसि ते ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे कर्ण भूषण के लिए कानों द्वारा वांछित, गुरु, देवता आदि की प्रसन्नता से पाप दूर करने के कारण पवित्र ओर कोमल फूल ग्रहण करने पर सुख देते है वैसे ही कानों को भले लगनेवाले पवित्र ओर कोमल आपके वचन हम लोगों द्वारा गृहीत होने पर सुख देते हैँ