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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 43, Verses 33–35

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 43, verses 33–35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

एतदप्यात्मनैवात्मा फलमाप्नोति भाषितम् । हरिपूजाक्रमाख्येन निमित्तेनारिसूदन ॥ ३३ ॥ वरमाप्नोति यो वापि विष्णोरमिततेजसः । तेन स्वस्यैव तत्प्राप्तं फलमभ्यासशाखिनः ॥ ३४ ॥ सर्वेषामुत्तमस्थानां सर्वासां चिरसंपदाम् । स्वमनोनिग्रहो भूमिर्भूमिः सस्यश्रियामिव ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

नित्य के अभ्यास और विचार से चित्त बहुत जल्दी निर्मल हो जाता है। आम ही धीरे-धीरे पुष्प, फल आदि में अतिसुगन्धिरूप दशा को प्राप्त होता है ॥३ २॥ हे शत्रुतापन, शास्त्र में विष्णु पूजाक्रमरूप निमित्त से जो फल कहा गया है उसे भी अपने ही संकल्प से प्राप्त करता है