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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 43, Verse 36

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 43, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 36

संस्कृत श्लोक

अप्युर्वीखननोत्कस्य कर्षतोऽपि शिलोच्चयम् । स्वमनोनिग्रहादन्यो नोपायोऽस्तीह कश्चन ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

जो अमित तेजवाले विष्णु से वरदान पाता है। उसने भी अपने ही अभ्यास रूपी वृक्ष का वह फल प्राप्त किया ॥ ३ ४॥ जैसे धान आदि बीजों के अंकुर का उद्गम स्थान खेत होता है वैसे ही सब श्रेष्ठ पुरुषार्थो के आग्रहों तथा सब चिरकाल के लिए भोग्य सम्पत्तियों का उद्गम स्थान अपना मनोनिग्रह ही हे ॥ ३ ५॥ निधि, रत्न आदि के लाभ के लिए पृथ्वी खोदेने के लिए उत्सुक पुरुष का या अश्वमेध के अश्व को खोजने के लिए उत्सुक सगर लड़कों का अथवा मन्दराचल को खींच रहे देवता, असुर आदि का अपने मन के निग्रह के सिवा दूसरा कोई भी उपाय नहीं है यानी मन की एकाग्रता के बिना महाकारयों की सिद्धि कदापि नहीं हो सकती है