Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 44, Verses 33–38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 44, verses 33–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 33-38
संस्कृत श्लोक
अथ तत्कालकल्लोलप्रलापाकुलचेष्टितैः ।
सोरस्ताडनमूर्च्छोत्थनेत्रवारिवहाप्लुतैः ॥ ३३ ॥
क्रमेण स्वजनैः क्षुब्धैस्ताराक्रन्दादिघर्घरैः ।
निष्कालितममङ्गल्यमपुनर्दर्शनाय वै ॥ ३४ ॥
नीतं श्मशानं मांसान्त्रवसापङ्ककलङ्कितम् ।
शुष्काशुष्करसक्लिन्नं कंकालशतसंकुलम् ॥ ३५ ॥
गृध्राभ्रच्छन्नसूर्यांशुचिताज्वलननिस्तमः ।
शिवाशिवमुखज्वालाजालपल्लवितावनि ॥ ३६ ॥
वहद्रक्तसरित्स्नातमग्नकङ्कोग्रवायसम् ।
रक्तार्द्रतन्त्रीप्रसरजालाबद्धजरत्खगम् ॥ ३७ ॥
तत्र ते ज्वलने दीप्ते चक्रुस्तं भस्मसाच्छवम् ।
बान्धवाः सलिलापूरं समुद्रा इव वाडवे ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर उस समय राशिभूत निरन्तर प्रलापों
से व्याकुल चेष्टा वाले छाती पीटने के साथ मूर्च्छा से उत्पन्न नेत्र के जलप्रवाह से सराबोर दुःखी
आत्माओं द्वारा, जो दीर्घं विलाप आदि के घर्घर शब्द से पूर्ण थे, उसका अमंगल शव फिर न देखने के
लिए घर से बाहर निकाला गया और श्मशान में ले जाया गया। वह श्मशान माँस, आँतें और चर्बी के पंक
से दूषित, सूखे और ताजे खून से तर तथा सैकड़ों कंकालों से व्याप्त था, चील-गीधरूपी मेघों से
उसमें सूर्य की किरणे आच्छन्न थी, चिता की अग्नि से अन्धकार न था, सियारों के मुख से निकली हुई
अशुभ ज्वालाओं से उसमें पृथ्वी पल्लवयुक्त-सी प्रतीत होती थी, वहाँ पर बह रही खून की नदियों में
कोई सफेद चील और कौए स्नान करते थे और कोई डूब गये थे, खून से तर आँतों के समूहरूपी जाल
में बूढे पक्षी वेधे हुए थे | वहाँ पर उन बन्धुओं ने प्रदीप्त अग्नि में जैसे समुद्र बड़वानल में अपने जलप्रवाह
को भस्म करते हैं वैसे ही उसे भस्म किया