Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 44, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 44, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
आबाल्यात्प्रविरक्तेन चेतसा स व्यराजत ।
निष्कलङ्कावदातेन भुवनं नभसा यथा ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे निष्कलंक निर्मल आकाश में भुवन विराजमान् होता है वैसे ही
बाल्यावस्था से विरक्त निष्कलंक निर्मल चित्त से वह विराजमान था