Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 45, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 45, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
तमसौ श्वपचो नागं कौतुकोद्धुरया दृशा ।
चिरमालोकयामास स्पन्दयुक्ताचलोपमम् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
उस चाण्डाल ने
कौतूहल से विस्फारित दृष्टि से स्पन्दयुक्त पर्वत के तुल्य उस हाथी को चिरकाल तक देखा