Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 46, Verses 11–16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 46, verses 11–16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 46 · श्लोक 11-16
संस्कृत श्लोक
भो कटंजेति सहसा वदन्कीरमहीपतिम् ।
इह राजा भवन्तं वा कच्चिद्गेयक्रियाविदम् ॥ ११ ॥
रक्तकण्ठं मानयति रागवानिव कोकिलम् ।
आपूरयति वा कच्चिद्गृहवस्त्रासनार्पणैः ॥ १२ ॥
मधू रसालविटपं फलपुष्पभरैरिव ।
दर्शनेन तवाद्याहं परां निर्वृतिमागतः ॥ १३ ॥
पद्मं सूर्योदयेनेव चन्द्रोदय इवौषधी ।
आनन्दानामशेषाणां लाभानां महतामपि ॥ १४ ॥
विश्रामाणामनन्तानां सीमान्तो बन्धुदर्शनम् ।
श्वपचे प्रवदत्येवं राजा यावत्तया तया ।
चकार तत्कालजया चेष्टयैवावधीरणम् ॥ १५ ॥
तावद्वातायनगताः कान्ताः प्रकृतयस्तथा ।
श्वपचोऽयमिति ज्ञात्वा म्लानतामलमाययुः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
उसने "कटंज' इस
पूर्वनाम से कीर देश के अधिपति गवल का सहज संबोधन करते हुए कहा : जैसे श्रृंगारी पुरुष
मधुरकण्ठवाले कोकिल का सम्मान करता है वैसे ही यहाँ पर राजा गानविद्या में कुशल मधुर कण्ठवाले
आपका सम्मान करता है क्या ? जैसे वसन्त फल ओर पुष्पों की राशियों से आम के वृक्ष को पूर्ण कर
देता है, वैसे ही घर, वस्त्र, आसन आदि के दान से राजा आपको पूर्ण करता है क्या ? आपके दर्शनों से
सूर्योदय से कमल के समान तथा चन्द्रमा के उदय से औषधियों के समान मैं परम आनन्द को प्राप्त हुआ
हूँ। बंधुओं का दर्शन सब आनन्दो को, बड़े-बड़े लाभों की और अनन्त विश्रामो की चरम सीमा हे ।
चाण्डाल के ऐसा कहने पर राजा ने उस काल में उत्पन्न हुई विभिन्न चेष्टाओं से ही उसका तिरस्कार
किया। उसी समय झरोखे में बैठी हुई स्त्रियों और अमात्यआदि प्रकृतियाँ यह चाण्डाल है यह जानकर
अत्यन्त उदास हुई