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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 47, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 47, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । मुहूर्तद्वितयेनाथ गाधिराधिभवभ्रमात् । प्रशशासाकुलीभावो वेलावर्त इवाम्बुधेः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्र, तदनन्तर श्रीगाधिजी जैसे समुद्र का अति संक्षुब्ध तटवर्ती आवर्त शान्त होता है ऐसे पूर्वोक्त संसार भ्रम से शान्त हुए

सर्ग सन्दर्भ

छियालीसवाँ सर्ग समाप्त सैंतालीसवाँ सर्ग अतिथि से अपना पूर्वोक्त कीरराज वृत्तान्त सुन कर, स्वयं वहाँ जाकर, देखकर और पुनः पुनः पूछ कर गाधि का विस्मित होना ।