Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 47, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 47, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
मनोराज्यमपि प्राज्ञा लभन्ते व्यवसायिनः ।
गाधिना स्वप्नसंदृष्टं गत्वा लब्धमखण्डितम् ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
उद्योगी बुद्धिमान् पुरुष, मनोराज्य को भी पा जाता हैँ । गाधि ने जाकर स्वप्न में देखा हुआ
ज्यों का त्यों पाया