Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 47, Verses 40–41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 47, verses 40–41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
तच्चेदृशनिजाचारं भूतमण्डलमागतः ।
करभः कण्टकार्थ्येकः कारञ्जमिव काननम् ॥ ४० ॥
तत्र संवित्स्थितेनैव संनिवेशेन वै पुनः ।
अपश्यद्भ्रामकं कंचिद्गन्धर्व इव पत्तनम् ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे कटं को चाहनेवाला अकेला ऊँट बबूल के वन में
जाता है वैसे ही गाधि एकाकी ही पूर्वोक्त प्रकार के आचार-विचारवाले उक्त भूतण्डलनामक देश में
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