Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 47, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 47, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
चित्तचिन्तितविस्तारं तन्निवेशमयं परम् ।
गन्धर्ववदसावात्मश्वपचत्वं च दृष्टवान् ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
गन्धर्व के
समान गाधि ने जिसमें जन्म आदि के विस्तार का चित्त में विचार किया था ओर जो गृह आदि में प्रचुर
आसक्तिवाला था इस तरह अपना चाण्डालत्व चिहों से देखा