Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 47, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 47, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
तेनैव संनिवेशेन प्राग्दृष्टं श्वपचास्पदम् ।
तस्य कामपि वैराग्यपदवीमनयन्मनः ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
पहले देखे गये चाण्डाल गृह ने
अपने उसी आकार-प्रकार से गाधि के मन को अपूर्वं वैराग्य में पहुँचा दिया