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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 47, Verses 45–46

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 47, verses 45–46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 45,46

संस्कृत श्लोक

प्रावृडासारलुठितं भित्तिजातयवाङ्कुरम् । पर्यस्तच्छादनार्धाङ्कं किंचिदादृष्टतल्पकम् ॥ ४५ ॥ दारिद्र्यं तद्दृढमिव दौर्भाग्यमिव कुड्यमत् । भ्रष्टाङ्गमिव दौरात्म्यं दौःस्थित्यमिव खण्डितम् ॥ ४६ ॥

हिन्दी अर्थ

वह चाण्डालगृह वर्षर्तु की मूसलाधार वृष्टि से छिन्न-भिन्न हो गया था, उसकी दीवारों पर जौ के अंकुर जमे थे, उसका आधा छण्पर अस्त-व्यस्त हो गया था एवं उसमें कुछ-कुछ शयन के भग्नावशेष दृष्टिगोचर हो रहे थे । वह दारिद्रय के समान कठोर था, दुर्भाग्य के समान दीवारमात्र अवशिष्ट गृहाकार था, चौर्य आदि दोरात्म्य के समान उसके अवयव शिथिल हो गये थे ओर दुर्दशा के समान उसका एक भाग खण्डित हो गया था