Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 47, Verses 47–50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 47, verses 47–50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 47-50
संस्कृत श्लोक
गाधिर्दन्तावदलितैर्गवाश्वमहिषास्थिभिः ।
धवलैर्व्याप्तपर्यन्तं साक्ष्यं कर्तुमिव स्थितैः ॥ ४७ ॥
भुक्तं पीतं पुरा तेन येषु खर्परकेषु वै ।
तैरस्पन्दाभ्रसलिलैः पानपूर्णैरिवावृतम् ॥ ४८ ॥
ताभिरेवान्त्रतन्त्रीभिः संशुष्काभिलतावृतैः ।
तृष्णाभिरिव दीर्घाभिः परितः परिवेष्टितम् ॥ ४९ ॥
चिरमालोकयामास स तदात्मगृहं जवात् ।
प्राक्तनं शुष्कशवतां यातं देहमिवात्मवान् ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
गाधि ने दाँतों से चबाई हुई गाय, घोड़े, भैंस आदि की सफेद हड्डियों
से, जो मानों गवाही देने के लिए वहाँ पर पडी थीं, चारों ओर व्याप्त, जिनमें उसने पहले भोजन और
पान किया था, वर्षा के निश्चल जल से भरे हुए अतएव ऐसा मालूम पडता था आसव आदि से भरे हैं ऐसे
खप्परों से आवृत, तृष्णाओं के समान लम्बी लम्बी सूखी हुई उन्हीं आँतों से लता के समान स्तम्भ आदि
के वेष्टनों द्वारा परिवेष्टित उस प्राक्तन अपने घर को शुष्क शवप्राय हुए प्राक्तन देह के समान बड़ी
त्वरा से चिरकाल तक देखा