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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 48, Verses 32–34

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 48, verses 32–34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

अहो नु खलु दीर्घेण मनोमोहेन वल्गता । वैवश्यमुपनीतोऽहं जालेनेव शकुन्तकः ॥ ३२ ॥ हा धिक्कष्टमबुद्धं मे मनो वासनया हतम् । पश्यति भ्रमजालानि विततानि शिशोरिव ॥ ३३ ॥ एषा हि माया महती तेन मे चक्रधारिणा । दर्शितेत्यधुना साधु मया स्मृतमखण्डितम् ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

कष्ट की बात है, जैसे विस्तार को प्राप्त हो रहे जाल से पक्षी विवश हो जाता है वैसे ही मैं फैल रहे मन के दीर्घं मोह से विवश हो गया हूँ