Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 48, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 48, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
दत्त्वार्ध्यं कीर्णकुसुमः प्रणम्याशु प्रदक्षिणैः ।
विष्णुमाह द्विजो वाक्यमम्भोदमिव चातकः ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
पुष्पों को बिखेरते हुए गाधि ने
अर्घ्य देकर और प्रदक्षिणा के साथ शीघ्र प्रणाम कर जैसे चातक मेघ से कहता है वैसे ही विष्णु भगवान्
से यह वाक्य कहा