Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 48, Verse 68
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 48, verse 68 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 68
संस्कृत श्लोक
सर्वदैव समग्रासु विहरन्नसि दृष्टवान् ।
दिक्षु प्रोन्मत्तक इव विभ्रमं मनसा मुने ॥ ६८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे मुनि, केवल ये ही
पूर्वोक्त भ्रम तुमने नहीं देखे प्रत्युत सब कालों मे समस्त दिशाओं में मदोन्मत्त की नाई घूम रहे तुमने मन
से विशिष्ट भ्रम देखा है