Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 49, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 49, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 49 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
अमूर्तो भगवान्कालो ब्रह्मैव तमजं विदुः ।
न जहाति न चादत्ते किंचित्कस्य कदेति च ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
इसी अर्थ को स्पष्ट करते है।
अमूर्त जो भगवान काल है, उसे तो पण्डित लोग जन्मादि विकार रहित ब्रह्म ही कहते है । वह न तो
कभी किसी का कुछ भी त्याग करता है ओर न कभी किसी का कुछ भी ग्रहण करता हे