Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 49, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 49, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 49 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
समानप्रतिभासोत्थसंभ्रमं भ्रान्तचेतसः ।
तथा तं दृष्टवन्तस्ते भूतकीरजनोच्चयाः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रासंगिक शंका का खण्डन कर प्रस्तुत का अवलम्बन कर कहते हैं।
उन भ्रान्तचित्तवाले भूतदेश के और कीर देश के लोगों ने सदृश प्रतिभास से उत्पन्न भ्रम को वैसे
ही देखा