Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 49, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 49, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 49 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
भूतकीरपुरे मोहाद्दृष्टवांस्तत्तथा भवान् ।
इत्येतत्संभवत्येव दृश्यते हि जनैर्भ्रमः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
श्री भगवान् ने कहा : हे ब्रह्मन्, यह जगत् मायारूपी महाशम्बरासुर का आडम्बररूप हे । इसमें
आत्मतत्त्व के विस्मरण से यानी आवरण के निमित्तभूत अज्ञान से सब आश्चर्यमय कल्पनाएँ होती हैं ॥ २ ४॥
माया में हजारो अघटित घटनाएँ हो सकती है, ऐसा कहते है।
तुमने भूतमण्डल और कीरनगर मे जो वैसा देखा, वह सब संभव ही हे, क्योकि निद्रा आदि में
असंभावित पदार्थो का भ्रम लोगों को दिखाई ही देता है