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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 49, Verse 31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 49, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 49 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

द्रष्टानुभूतमप्यर्थं कदाचिद्विस्मरत्यलम् । कदाचिदप्यदृष्टं तु चेतः पश्यति दृष्टवत् ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

जो वस्तु कभी न देखी गई हो, दूसरे देश में हो और बीत चुकी हो, उसका सामने वर्तमान रूप से दर्शन कैसे हो सकता है ? ऐसी शंका होने पर कहते हैँ । जैसे द्रष्टा पुरुष कभी अनुभूत वस्तु को भी बिलकुल भूल जाता हे वैसे ही चित्त कभी न देखी गई वस्तु को भी पूर्वदृष्ट के समान देखता है