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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, Verse 44

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 5, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् । अद्वितीयो विशोकात्मा विज्वरो भव राघव ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

आत्मभावापन्न पुरुष की जीवन्मुक्तिरूप विश्रान्ति दिखलाते हैं। ॐ आँखें आधी बन्द करके सूर्य के सन्मुख सो रहे पुरुष को भ्रान्तिवश जो मयूर की पूँछ के सदृश दिखाई देता है । हे श्रीरामचन्द्रजी, इस आत्मतत्त्व में न शोक है, न मोह है, न जन्म है और न कोई जन्मनेवाला हे । यहाँ जो है, वही है। आप संतापरहित होइये ॥४ ३॥ हे श्रीरामचन्द्रजी, आप सुख-दुःख आदि शारीरिक द्वो के विक्षेप से रहित, नित्य सत्त्व में स्थित होने के कारण रजोगुण ओर तमोगुण से होनेवाले मानसिक विक्षेप से शून्य अतएव शारीरिक विक्षेप और मानसिक विक्षेप की निवृत्ति के उपायभूत योग, क्षेम की चिन्ता से विहीन आत्मवान्‌, अद्वितीय, शोकरहित ओर सन्तापरहित होइये