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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verses 2–4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 50, verses 2–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 2-4

संस्कृत श्लोक

क्व मुहूर्तद्वयस्वप्नसंभ्रमाल्लोकदृष्टता । क्वानेकवर्षसंभुक्तश्वपचावनिपभ्रमः ॥ २ ॥ क्व संभ्रमोपलब्धत्वं क्व प्रत्यक्षनिदर्शनम् । क्वासत्यत्वमसंदिग्धं क्व सत्यपरिणामिता ॥ ३ ॥ अतो वच्मि महाबाहो मायेयं विषमान्वहम् । असावधानमनसं संयोजयति संकटे ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

दुज्ञनिता को ही तीन प्रकारों से दशति हैं। कहाँ दो मुहूर्त के भ्रम से लोकदर्शन, और कहाँ अनेकों वर्षो में मुक्त होनेवाला चाण्डाल का भ्रम, कहाँ भ्रमावस्था में प्राप्ति ओर कहाँ प्रत्यक्ष दर्शन, कहाँ निसन्देह असत्यता ओर कहाँ सत्य मेँ परिणत होना ? इसलिए मैं कहता हूँ, हे महाबाहो, यह विषम माया असावधान मनवाले पुरुष को प्रति दिन संकट में डालती हे