Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 50, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
चेतनं चित्तरिक्तं चेद्भावितं तत्स्वसंसृतेः ।
आमूलमेव दग्धानि विद्धि मूलानि सिद्धवत् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
यदि चेतन चित्त से
पृथक् है यानी कूटस्थ हे, यों भावना की जाय, तो अपने सार के मूलो को (काम, कर्म, वासना आदि
को) मूलाज्ञाननाश के साथ महासिद्ध के समान जले हुए ही जानिये