Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verse 53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 50, verse 53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
तावत्संमोहवेतालो देही यावदनात्मवान् ।
आत्मज्ञ एव संयुक्तश्चेतनेनेति तद्विदः ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
तभी तक अज्ञान रूपी वेताल है जब तक
देहधारी सत् भी आत्मा की अज्ञान से असत्ता मानने के कारण अनात्मवान् हे अतएव वह अचेतन है,
इसलिए आत्मज्ञानी ही चेतन से संयुक्त है, ऐसा विद्वानों का कथन है