Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 50, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
अनात्मज्ञो हि दुःखेहः प्रस्फुरन्नपि भूतले ।
शव एव भ्रमत्युच्चैरात्मज्ञस्तु सचेतनः ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
जो आत्मतत्त्व को नहीं
जानता, उसकी सबकी-सब चेष्टाएँ दुःख के लिए ही हैँ । वह भूतल में इधर-उधर चलता फिरता हुआ
भी शवरूप से ही भ्रमण करता है, केवल आत्मज्ञानी ही सचेतन है, ऐसा पण्डित लोग कहते हैं