Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verse 55
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 50, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
दूरादात्मज्ञता याति चित्ते पीवरतां गते ।
आलोकलक्ष्मीरभितो महामेघ इवोत्थिते ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे चारों ओर से घने मेघ के उदित होने पर प्रकाश शोभा दूर चली जाती हे वैसे ही चित्त के स्थूल होने
पर आत्मज्ञता, जो थोडी बहुत उपार्जित भी हो चुकी हो, दूर भाग जाती है