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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 50, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अस्य संसाररूपस्य मायाचक्रस्य राघव । चित्तं विद्धि महानाभिं भ्रमतो भ्रमदायिनः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ द्वारा उपदिष्ट माया चक्र को रोकने के प्रकार का पहले विस्तार करने के लिए उक्त का अनुवाद करते हैं। श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रघुवर, आप चित्त को घूम रहे और भ्रान्ति देनेवाले इस संसारूपी मायाचक्र महानाभि (पहिये के बीच का भाग) जानिये