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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verses 70–71

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 50, verses 70–71 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 70,71

संस्कृत श्लोक

तृष्णापिशाच्या परिचर्यमाणं विश्रान्तमज्ञानमहावटेषु । भ्रान्तं चिरं देहशतेष्वटव्यां स्वसंसृतौ चेतनवर्जितेषु ॥ ७० ॥ विवेकवैराग्यगुरुप्रयत्नमन्त्रैः स्वतन्त्रैः स्वचिदात्मगेहात् । नोत्सादयेच्चित्तपिशाचमेनं यावत्कुतस्तावदिहात्मसिद्धिः ॥ ७१ ॥

हिन्दी अर्थ

उसी चित्त का पिशाचरूप से वर्णन कर उसे न हटाने से मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती, ऐसा कहते हैं । २ कौए के पक्ष में श्मशान आदि गर्हित स्थानों में सदा आसक्त, मांस के ग्रसन से पुष्ट शव आदि के मर्मस्थानों को नोचने में कठोर चोंचवाले, एक आँखवाले, गाढ अन्धकार के भागों के समान काले, वृक्ष आदि के भारभूत, दुष्ट चेष्टाएँ करनेवाले, कर्णकठोर काँव-काँव शब्द कर रहे दुर्गन्धि से चले हुए कौए को, यों अर्थ करना चाहिए। अज्ञानरूपी महान्‌ वट॒वृक्षों पर बैठे हुए, तृष्णारूपी पिशाचिनी द्वारा सेव्यमान्‌, चित्त के हटने पर चेतनरहित अनन्त कोटि देहरूपी अरण्य में चिरकाल तक भटके हुए इस चित्तरूपी पिशाच को चिदात्मा के गृहभूत हृदय से जब तक विवेक, वैराम्य, गुरुसमीप गमन, पुरुषप्रयत्न आदि स्वतन्त्र मन्त्रों द्वारा पुरुष नहीं हटाता तब तक यहाँ पर आत्मसिद्धि कैसे हो सकती है ?