Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verses 72–73
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 50, verses 72–73 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 72,73
संस्कृत श्लोक
शुभाशुभास्यं हतमानवौघं चिन्ताविषं कायकुकञ्चुकं च ।
अजस्रमच्छश्वसनाशनं च सर्वस्य नानाभयनाशदं च ॥ ७२ ॥
हृदज्जदुःशाल्मलिकोटरस्थममोघया चित्खगमन्त्रशक्त्या ।
नीत्वा शमं राम मनोमहाहिं भयं भृशं प्रोज्झ्य भवाभयात्मा ॥ ७३ ॥
हिन्दी अर्थ
अब मन का सर्परूप से निरूपण करते हुए उसका त्याग कराते हैं।
हे श्रीरामचन्द्रजी, चित्तरूपी सोप को, जिसकी शुभ और अशुभ रूप दो दाढ हैं, जो एक-दो
नहीं अनेकानेक मनुष्यों की हत्या कर चुका है, चिन्ता ही जिसका विष है शरीर ही गर्हित केचुल हे,
निरन्तर श्रम आदि दोषों से रहित प्राण वायु ही जिसका भोजन है, जो सबको विविध भय ओर मृत्यु
देता है एवं हृदयकमल रूपी सेमर के पेड के खोखले में स्थित है, चिदेकरस ब्रह्मरूपी गरुड के बोधक
"सत्यं ज्ञानम् अनन्तं ब्रह्म" इत्यादि मन्त्रों के अमोच प्रभाव से मूलअज्ञान के साथ नष्ट कर भय को
सर्वथा मिटा कर निर्भय होड्ये