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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verses 74–75

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 50, verses 74–75 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 74,75

संस्कृत श्लोक

अमङ्गलाकारधरः शरीरशवावलीसंततसेवनेन । दिगावलीसंभ्रमणश्रमार्तः श्मशानसेवी वपुषा क्षतेन ॥ ७४ ॥ भोगमिषो दिक्ष्वभिधावमान उत्कन्धरो धीरविवृद्धगर्धः । उड्डीय वै गच्छति चित्तगृध्रो देहद्रुमात्तन्निपुणं जयस्ते ॥ ७५ ॥

हिन्दी अर्थ

शरीररूप शवराशियों के निरन्तर अनुसन्धान से (दूसरे पक्ष में भक्षण से) अमंगल आकार को धारण करनेवाला, विविध दिशाओं में भ्रमण से उत्पन्न श्रम से पीडित, अपमान, व्यय, शोक, भय आदि से (दूसरे पक्ष मे कौए, चील आदि के चोचं के प्रहारो से) क्षत-विक्षत शरीर से सुषुप्ति में श्मशान वृक्ष के तुल्य सुप्त देह का (श्मशान-वृक्ष का) सेवन करनेवाला, भोगों की अभिलाषावश दिशाओं में इधर-उधर दौड रहा, ऊपर को गर्दन किया हुआ एवं अधीर ओर बढी-चढ़ी अभिलाषावाला चित्तरूपी गिध्ध यदि आपके देह वृक्ष से उडकर चला जाय, तो आपकी खासी जीत है