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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verses 76–77

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 50, verses 76–77 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 76,77

संस्कृत श्लोक

भ्रान्तं वनान्तेषु दिगन्तरेषु फलार्थिनं चञ्चलमाकुलाङ्गम् । जन्मावनेर्जन्ममहिं प्रयातं संसारबन्धं जनतां हसन्तम् ॥ ७६ ॥ द्रुमेऽक्षिनासाकुसुमे भुजादिशाखे विलोलाङ्गुलिजालपत्रे । समुल्लसन्तं परिमारयान्तर्मनोमहामर्कटमङ्ग सिद्ध्यै ॥ ७७ ॥

हिन्दी अर्थ

अव उसी मन का बन्दर के रूप से निरूपण करते है । हे श्रीरामचन्द्रजी, भला चाहनेवाले, चंचल तथा व्याकुल अंग-प्रत्यंगवाले मनरूपी महामर्कट, जो वनप्रान्तों में दिशाओं के मध्यो मे खूब भटका है, एक जन्मरूपी भूमि से दूसरी जन्मरूपी भूमि में गया है, चिन्ता ओर उसके संसार बन्धन का अपनी चेष्टाओं द्वारा अनुकरण कर रहा है तथा आँख ओर नाक जिसके फूल हँ, भुजा आदि जिसकी शाखाएँ हैं और चंचल अंगुलियाँ जिसके पत्ते हैं, ऐसे देहरूपी वृक्ष पर उल्लास को प्राप्त हो रहा है, उसको सिद्धि के लिए चारों ओर से घेरकर भीतर ही भीतर मार डालिये