Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verse 85
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 50, verse 85 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 85
संस्कृत श्लोक
अमलमिति च कृत्वा चेतसा वीतशङ्कमुपशमितमनोऽन्तः सर्वमादेहमेव ।
तृणलवलघु पश्यँल्लीलया हेयदृष्ट्या पिव विहर रमस्व प्राप्तसंसारपारः ॥ ८५ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वोक्त रीति से और पूर्व मे उपदिष्ट तत्त्वबोध
से प्रत्यगात्मा में उपशम को प्राप्त हुए मन को राग आदि मलो से शून्य बनाकर निर्मल चित्त से स्थूल,
सूक्ष्म और कारण देहपर्यन्त सब दृश्य समूह को हेयदुष्टि से तिनके के टुकड़े से भी तुच्छ (स्वप्न शरीर
आदि के समान अत्यन्त उपेक्षा के योग्य) समझकर संसार से पार हुए आप प्रारब्ध शेष के भोगार्थ *
आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः“ इस श्रुति में प्रदर्शित लीला से लोक संग्रह के लिए
सोम आदि का पान कीजिये, ऋत्विक् आदि के साथ यज्ञो मेँ विहार कीजिये तथा शास्त्र से अविरुद्ध
लौकिक विषय में रमण कीजिये । उससे आपको पुनर्बन्धन की प्राप्ति नहीं होगी