Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 51, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 51, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 51 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
उद्दालकवदालूनं विशीर्णं भूतपञ्चकम् ।
कृत्वा कृत्वा धिया धीरधीरयान्तर्विचारय ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त आख्यायिका का अवतरण कर उसके अर्थ विचार कर्तव्यता को कहते हैं।
तत्" ओर त्वम्! आदिपदार्थ के शोधन में तत्पर बुद्धि से “अन्नेन सोम्य शुगेनापो मूलमन्विच्छ"
इस श्रुति में प्रदर्शित युक्ति द्वारा कारण से अतिरिक्त कार्याकुर के अपलाप से देह आदि के आरम्भक
ओर बाह्य प्रपंच के आरम्भक पाँच महाभूतो को उद्दालक मुनि के समान छिन्न-भिन्न ओर मूल अविद्या
के तहस-नहस होने से शिथिलकर उनके अधिष्ठानभूत सन्मात्र के अन्वेषण में धीरो से भी धीर बुद्धि से
मन में विचार कीजिये