Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 51, Verses 8–11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 51, verses 8–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 51 · श्लोक 8-11
संस्कृत श्लोक
जगज्जीर्णगृहस्यास्य कोणे कस्मिंश्चिदातते ।
भूमेरनिलदिग्नाम्नि भूभृद्भाण्डसमाकुले ॥ ८ ॥
गन्धमादनशैलेन्द्रनाम्नि काचित्किल स्थली ।
विद्यते कीर्णकुसुमा द्रुमकर्पूरकेसरा ॥ ९ ॥
विचित्रवर्णविहगा नानावल्लीविलासिनी ।
वनेचरव्याप्ततटी पुष्पकेसरभासिनी ॥ १० ॥
क्वचित्स्फीतमहारत्ना क्वचिल्लोलाम्बुजोत्पला ।
क्वचिन्नीहारकबरी सरसीदर्पणा क्वचित् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
इस जगत्रूपी जीर्ण-शीर्ण घर के किसी विस्तृत कोने में, जो पर्वतरूपी
उल्टे करके रक्खे हुए बर्तनों से भरा है और भूमि की आग्नेयी दिशा में गन्धमादन नाम से शेलराज पर
एक अद्भुत भूमि भाग हे । उसके ऊपर खूब फूल बिखर रहते हैं, फूले हुए पेड ही कपूर के तुल्य सफेद
पराग ओर केसरो से चारों ओर से व्याप्त होने के कारण उसके कर्पूर-केसर हैं; उस पर भाँति-भाँति के
पक्षी रहते हैं, नाना प्रकार की लताएँ सुशोभित रहती हैं, उसके तट वनपशुओं के झुण्डों से भरे रहते हैं,
फूलों के केसरो से उसकी शोभा कहीं अधिक बढी-चढी है, उसके किसी प्रदेश पर विशाल महारत्न हैँ
तो कहीं पर चंचल कमल खिले हैं, कहीं पर सरोवररूपी दर्पण उसकी शोभा बढ़ाये रहते हैं, तो कहीं पर
कुहरारूपी केशों से वह व्याप्त रहता है