Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 52, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
मनोमण्डूकिके व्यर्थमियन्तं कालमन्धया ।
भ्रमन्त्या भुवनं क्षिप्रं किं समासादितं त्वया ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे मनरूपी मेढकी, जरा बतला
तो सही, इतने समय तक व्यर्थ भुवन में (मेढ की के पक्ष में जल में) त्वरा से भटक रही अन्धी तूने
क्या फल पाया ?