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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 52, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

चकारासनमम्लानैः पत्रैरन्तस्वगुच्छकम् । मृदुमेघविधिर्वृन्दमम्भोदमिव तत्र सः ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

(०३) वहाँ पर उन्होंने जैसे इन्द्र मेघ को जिसके मध्य में बिजलियाँ स्वगुच्छ के समान फैली रहती हैं, राशिभूत करते हैं वैसे ही ताजे (न मुरझाये हुए) पत्तों से कोमल आसन बनाया, जिसमें उनका शरीर ही गुच्छ के समान शोभित हो रहा था