Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, Verses 32–33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 52, verses 32–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
अयं सोऽहमिति व्यर्थं दुर्दृष्टिरवलम्बिता ।
त्वया मूढविनाशाय शङ्काविषविषूचिका ॥ ३२ ॥
अनन्तस्यात्मतत्त्वस्य तन्वीति मनसि स्थितिः ।
न संभवति बिल्वान्तर्वासितादन्तिनोर्यथा ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
मुझसे कौन अपराध हुआ ? जिससे विनाश के लिए आप मेरा त्याग करते हैं, ऐसा यदि मन की ओर
से प्रश्न हो, तो देहआदि में अहंकाररूपी दुर्द्वष्टि का अवलम्बन ही तुम्हारा अपराध है, ऐसा कहते हैं।
तुमने यह, वह, मैं यों व्यर्थ दुर्दूष्टि का अवलम्बन किया हे । वह दुर्दृष्टि शंका विष से हुई विषूचिका
के समान मिथ्या हेतुक होती हुई भी मूढ़ों के विनाश के लिए होती है, यही तुम्हारा अपराध है, यह अर्थ
है